कविता पॅलेस्टिनी

कविता पॅलेस्टिनी


कविता पॅलेस्टिनी १

एक

गाझामधल्या उनाड पोरांच्या नावे

रे गाझामधल्या उनाड पोरांनो!
तुम्ही जो माझ्या घराबाहेर गल्लीत
दंगा-मस्ती करीत माझ्या नाकीनऊ आणत होता,
तुम्ही जे रोजची सकाळ 
दणदणाटाने भरत होता,
तुम्ही जी माझी आवडती फुलदाणी फोडून टाकलीत 
आणि
माझ्या खिडकीबाहेर फुललेले एकमेव फुल चोरुन नेलेत,
परत या
आणि घाला धिंगाणा,
करा दंगामस्ती,चिक्कार गोंगाट
आणि फोडून टाका सगळ्या फुलदाण्या,
सारी फुले चोरुन न्या
पण
माघारी या...
बस्स माघारी या.

मराठी अनुवाद
भरत यादव
Bharat Yadav 

हिंदी अनुवाद
Asad Zaidi 
असद जैदी

ख़ालिद जुमा

॥ ग़ज़्ज़ा के शैतान बच्चों के नाम ॥

ओ ग़ज़्ज़ा के शैतान बच्चो! 
तुम जो मेरे घर के बाहर गली में शोर शराबा करते हुए मेरी नाक में दम किये रखते थे, 
तुम जो हर सुबह को हुड़दंग और धमक से भर दिया करते थे, 
तुम जिन्होंने मेरा प्यारा गुलदान तोड़ डाला और मेरी खिड़की के बाहर खिला एकमात्र फूल चुरा लिया, 
लौट आओ 
और मचाओ ख़ूब शोर 
और तोड़ दो सारे गुलदान। चुरा लो सारे फूल। 
लौट आओ… 
बस लौट आओ। 

(ख़ालिद जुमा, ग़ज़्ज़ा के फ़िलस्तीनी कवि)

©Khaled Juma

Oh Rascal Children Of Gaza

Oh rascal children of Gaza,
You who constantly disturbed me with your screams under my window,
You who filled every morning with rush and chaos,
You who broke my vase and stole the lonely flower on my balcony,
Come back – 
And scream as you want,
And break all the vases,
Steal all the flowers,
Come back,
Just come back…
टिप्पणी पोस्ट करा (0)
थोडे नवीन जरा जुने