भाषा

भाषा

भाषा

भाषा तीच शिल्लक राहील
जे मजूर बोलतील-
ज्या भाषेतून हाका मारतील
भाजीपाला विकणारे फेरीवाले-

शेतकर्‍यांच्या गाण्याचीच भाषा
बचावू शकेल-

कारण गरीबांची भाषादेखील
त्यांच्याप्रमाणे कष्टाळू आहे-
साहित्याच्या मिष्टान्नाविना सुद्धा
जगणं जाणते.

राजभाषा या
साहित्यनिर्मिती करू शकतात
मातृभाषा नाही बनू शकत.

मराठी अनुवाद
भरत यादव
Bharat Yadav 

मूळ हिंदी कविता

भाषा वही बचेगी 
जो मज़दूर बोलेंगे-
जिसमें आवाज़ लगाएंगे 
सब्जी बेचते फेरी वाले-

किसानों के गीत की ही भाषा 
बच पाएगी-

क्योंकि गरीबों की भाषा भी 
उनकी तरह मेहनकश है-
बिना साहित्य के मिष्ठान के भी जीना 
जानती है। 

राज भाषाएं-
साहित्य कर सकती हैं
मातृभाषा नहीं बन सकती।। 

©किताबगंज
Kitabganj
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