भाषा तीच शिल्लक राहील
जे मजूर बोलतील-
ज्या भाषेतून हाका मारतील
भाजीपाला विकणारे फेरीवाले-
शेतकर्यांच्या गाण्याचीच भाषा
बचावू शकेल-
कारण गरीबांची भाषादेखील
त्यांच्याप्रमाणे कष्टाळू आहे-
साहित्याच्या मिष्टान्नाविना सुद्धा
जगणं जाणते.
राजभाषा या
साहित्यनिर्मिती करू शकतात
मातृभाषा नाही बनू शकत.
मराठी अनुवाद
भरत यादव
Bharat Yadav
मूळ हिंदी कविता
भाषा वही बचेगी
जो मज़दूर बोलेंगे-
जिसमें आवाज़ लगाएंगे
सब्जी बेचते फेरी वाले-
किसानों के गीत की ही भाषा
बच पाएगी-
क्योंकि गरीबों की भाषा भी
उनकी तरह मेहनकश है-
बिना साहित्य के मिष्ठान के भी जीना
जानती है।
राज भाषाएं-
साहित्य कर सकती हैं
मातृभाषा नहीं बन सकती।।
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