चिमणीच्या धगीने
तापलेले लोक
उन्हाने थकलेले लोक
पावसाबद्दल बोलतायत
मातीने बनलेले लोक
मेंदूतून सुटलेले
हृदयातून निसटलेले लोक
एका छताविषयी बोलतायत
पैशात वाटले गेलेले लोक
कारल्याप्रमाणे वाढलेले
कडूनिंबावर चढलेले लोक
फुलांसारखे बोलतायत
काट्यांनी वेढलेले लोक
बेकारीत मेलेले लोक
फुटपाथवर पडलेले लोक
कमळाबद्दल बोलतायत
चिखलात उभे असलेले लोक
विद्वत्तेवर अडलेले लोक
रुढींनी कुढलेले लोक
समुद्राविषयी बोलतायत
विहिरीत पडलेले लोक
घशात अडकलेले लोक
पायात धडपडलेले लोक
दूधाबद्दल बोलतायत
ताक पोळलेले लोक
मंदिरात उभे असलेले लोक
अंधभक्तीत लडबडलेले लोक
नशिबाविषयी बोलतायत
सायन्स शिकलेले लोक
मराठी अनुवाद
भरत यादव
Bharat Yadav
मूळ हिंदी कविता
अफ़सोस
चिमनी के तपे लोग
धूप में थके लोग
बारिश की बात करते हैं
मिट्टी के बने लोग।
ज़ेहन से कटे लोग
दिल से हटे लोग
एक छत की बात करते हैं
पैसे से बटे लोग।
करैले से बढ़े लोग
नीम पर चढ़े लोग
फूलों सी बात करते हैं
काटों से कड़े लोग।
बेकारी में मरे लोग
फुटपाथ पर पड़े लोग
कमल की बात करते हैं
कीचड़ में खड़े लोग।
विद्वत पर अड़े लोग
रूढ़ियों के सडे़ लोग
समंदर की बात करते हैं
कुएं में पड़े लोग।
गर्दन में गड़े लोग
पैरों में पड़े लोग
दूध की बात करते हैं
छाछ से भी जले लोग।
मंदिर में खड़े लोग
अंधभक्ति में पड़े लोग
भाग्य की बात करते हैं
साइंस के पढ़े लोग।
©बच्चा लाल 'उन्मेष'
Bachcha Lal Unmesh