बुजुर्ग और हम

बुजुर्ग और हम

बुजुर्ग और हम

( १ )

आजकल 
माॅं-बाप,
दादा-दादी को ही 
सॅंभालने होते है रिश्ते,
बहू-बेटे और पोता-पोती के साथ।
दौर ही ऐसा चल रहा है की
माॅं-बाप की बातें चुभने लगी है 
बहूत ही ज्यादा।
कई घर टूटने के कगार पर हैं
लेकिन बुजुर्गों ने सॅंभाल कर 
रखा हुआ है
सभी रिश्तों का बोज
अपने कंधों पर।
अलिशान घरों में हमारे अपने ही
परायें हो जाना,
लानत की बात है पढ़े लिखें 
नयी नस्ल के लिए।

( २ )

घर की दिवारें रोती रहती है 
हर वक्त
उन बुजुर्गों के साथ,
जिन्हे उनके ही बच्चों ने ठुकराया है।
क्यूॅंं की उँची मकानों को 
खडा करनेवाले ही अब बन गये है 
किरायेदार और पराये भी।
खून,दूध,पसिना और 
आसूॅंओं का
कोई कभी हिसाब नही माॅंगता
मगर अब वक्त आ गया है शायद।
                            
©भरत यादव
Bharat Yadav
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